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मेरे प्रभु राम से अयोध्या फिर से जगमगाई है - Shree Ram Bhajan

श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा - नवरात्री उत्स्व क्यों मनाया जाता है

श्री दुर्गा नवरात्रि व्रत कथा   दुर्गा पूजन   यदि अखंड दीपक प्रज्वलित करके नौ तक प्रज्वलित रखना चाहते हो तो इसके लिए बड़े दीपक में घी भरा रहे बत्ती निरंतर प्रज्वलित रहे।  गंगाजल अथवा शुद्ध जल से तीन बार प्रक्षालित करले (धोकर) अथवा चावल भी धो ले तो यह अक्षत हो जायेगा।  पंचोचर से श्री गणेश जी का  पूजन करे।  यदि श्री दुर्गा जी की स्वर्ण या रजत  हो तो उसे सिंहासन पर अथवा जल पूर्ण कलश पर स्थापित करके पूजन करे।  यदि गणेश जी की मृतिका (मिट्टी ) की प्रतिमा हो तो उसका दर्पण में (प्रतिबिम्ब) देखकर तथा स्थापना स्थान को साफ़ करले एवं स्वयं को शुद्धकर था शुद्ध वस्त्र पहन कर प्रतिमा की स्थापना करे।  श्री दुर्गा नवरात्रि कथा एवं व्रत  व्रत विधान :- उपवास अथवा फलाहार की इस व्रत में कोई विशेष व्यवस्था या नियम नहीं है।  प्रातः नित्य कर्म से निर्वत होकर तथा स्नान करके मंदिर में अथवा घर पर ही नवरात्र काल में श्री दुर्गा जी का ध्यान करके श्रद्धा भक्ति सहित उनकी कथा प्रारम्भ की जाये।  यह व्रत तथा कथा - विधान कुंवारी कन्याओ के लिए विशेष लाभदायक है।  भगवती दुर्गा की कृपा से समस्त कष्टों, अरिष्टों तथा विघ्न बधाओ

पति पत्नी के बीच का रिश्ता बहुत ही अनमोल और प्यारा होता है

पति पत्नी के बीच का रिश्ता बहुत ही अनमोल और प्यारा होता है शादी के बाद दो इंसान पति पत्नी के रिश्ते में जुड़ते है और इस रिश्ते के साथ दोनों को एक नया परिवार भी मिलता है। और शादी के बाद पत्नी अपने घर परिवार को छोड़ कर पति के साथ रहने चली जाती है और यही से इनके नए जीवन की शुरुरात होती है।  चाहे प्यार  करके शादी हो या फिर घर वालो  की मर्जी से पर नयी जिंदगी की शुरुआत तो शादी के बंधन में बंधने से ही होती है।  यह सब तो आपको पता ही है चलो अब पति पत्नी के बिच के सहयोग और रहने के तरिके की बात करते है।  शादी के बाद पति पत्नी का जीवन बदल जाता है शादी के बाद दोनों की इच्छाएं बदल जाती है और सोच समझ में बदलाव आ जाता है , क्योकि शादी से पहले दोनों ही अकेले और अपने माता पिता के साथ रहे है और दोनों ने अपनी जिंदगी खुल कर जी है।  लेकिन शादी के बाद अब दोनों को एक दूसरे के पसंद और ना पंसद को ध्यान रखना दोनों को आपस में एक दूसरे की हर बात का पता होना चाहिए और एक  दूसरे से कोई गिले शिकवे नहीं  होने चाहिए।  पत्नी की पति से शिकायते  पति पत्नी का रिश्ता मजबूत के साथ साथ बहुत नाजुक भी होता है , और इस रिश्ते में दो

Women Day Special - महिला दिवस पर कुछ खास

लेखक - धुर्वील  जिनसे इनका सृजन होता है उनको ये गंदगी कहते है , रक्त के उन लाल बूंदो को ये मामूली कहते है।  पांच दिन उससे अछूत की तरह घृणा का व्यवहार करते है कैसे ये मासिक होने को शर्मसार कर अपने अस्तित्व का उपहास करते है।  पीरियड्स महावारी रजस्वला आखिर क्या  है ये बला ? तुम जो अपनी मर्दानगी  पर इतना  इतराते हो  दरअसल बाप तुम इस क्रिया से ही बन पाते हो।   कुछ मर्दो को नहीं है जरा सी तमीज उनके लिए है ये बस उपहास  की चीज।   हम 21 वी सदी जी रहे है  चाँद का नूर पी रहे है  पर विस्पर आज भी पैक करके दिया जाता है।  जीवनसाथी हो ऐसा राधा कृष्णा के प्यार जैसा  जैसे हमे कोई छूत की बीमारी है  ऐसे हमे सबसे अलग कर दिया जाता है  चुपचाप दर्द पीना सीखा देते है  किसी को पता न चले घर में  ये भी समझा देते है।  भाई पूछता है की पूजा क्यों नहीं की  तो उसे सर झुकाकर समझाना पड़ता है  चाहे दर्द में रोती रहू  पर पापा को देखकर मुस्कुराना पड़ता है।  दिल से दिल तक का सफर  पेट के निचले हिस्से को जैसे कोई निचोड़ देता है  कमर और जांघ की हड्डिया जैसे कोई तोड़ देता है  खून की रिस्ति बून्द के साथ तड़पती हूँ मैं  और जिसे तुमने

जीवनसाथी हो ऐसा - राधा कृष्णा का प्यार है जैसा

जीवनसाथी हो ऐसा - राधा कृष्णा का प्यार है जैसा  जीवनसाथी नहीं पहली आस हो तुम  रिश्तो में नहीं विश्वाश में हो तुम।    प्यार भरे दिन की शुरुआत हो तुम  मेरे लिए हर पल खाश हो तुम।  मेरी जिंदगी की पहचान हो तुम   मुझको समझने मे लाजवाब  हो तुम।    मेरे सुख दुःख में शामिल हो तुम  मुझको हसाने में  माहिर हो तुम।  मेरे परिवार का पिल्लर हो तुम  मेरी जिंदगी की चाबी हो तुम।  चाय में अदरक जैसे  हो तुम  मेरी कड़क चाय हो तुम।     मैं रास्ता भटक जाऊ तो सही रास्ता दिखाओगे तुम मेरी हिम्मत बन साथ खड़े हो जाओगे तुम।  मैं कुछ समझ न पाऊं तो समझाओगे तुम  जिंदगी की भाषा सिखाओगे तुम।    मेरे लिए समाज से टकराओगे तुम  मेरे हर हालात में कदम से कदम मिलाओगे तुम।  मेरी खातिर किसी और को अपनाओगे नहीं तुम  गलती हो जाये तो माफ़ कर जाओगे तुम।    मेरी मोहब्बत का मजाक नहीं उड़ाओगे तुम  हम जैसे भी है वैसे ही हमे अपनाओगे तुम।    दिल की धड़कन बनजाओगे तुम  और उस धड़कन को धड़कना सिखाओगे तुम।   अब कैसे बताये ये तुम्हे  अपना ये रिश्ता है ऐसा   राधा और कृष्णा  के साथ जैसा।     जिस तरह राधा कृष्ण एक साथ है पूरे  उसी तरफ हम तुम्हारे बिन है अ

दिल से दिल तक सफर - दिल के टूटे ख्वाब

दिल से दिल तक सफर  - दिल के  टूटे ख्वाब  ये दिल भी तो बेचारा था  हर किसी को ये गवारा न  था  हर किसी का हाथ दिल ने  थामा था  हर किसी को अपना माना था  पर ये उन्हें रास न आना था।     हर किसी का ये दिल तोड़ कर जाना था  किसी ने अपने दोस्त का हाथ थामा था  तो किसी ने मेरे ही दोस्त को अपना माना था।   माँ मेरा अभिमान और मेरा स्वाभिमान  इस दिल ने उन सबको समझाना  था  पर उन सबने ही हमको गैर माना था।  उनके  जाने के बाद तो ये सिलसिला था  ये दिल खुद से खफा था और खुद से नाराज था।   इस दिल ने तो उन्हें  बेवफा का नाम दिया था   पर उनके दोस्तों से पता चला कि उन्होंने हमे बेवफा का नाम दे  डाला था।  नारी का क्या दोष - समाज के बेबस नारी  इस दुःख भरी राह में दोस्तों ने संभाला था  और घरवालों का सहारा था।  जब जब दिल को कुछ समझ आता था  उससे पहले चाहने वाला  बहुत दूर चला जाता था।  अब तो बस उस बेवफा को ये बताना था  तेरा पास आना मेरे लिए अच्छा था तेरा दूर चले जाना भी अच्छा था  शायद ऊपर वाले ने हमारा साथ ही इतना  लिखा था। गांव की सभ्यता  इस दिल  जिस जिस को दिल दिया  उसी ने मेरा साथ छोड़  दिया  और मुझे छोड़ कर किसी और क

माँ मेरा अभिमान है - माँ मेरा स्वाभिमान है

माँ मेरा अभिमान और मेरा स्वाभिमान   माँ को अपने शब्दों में बयान कर दू मैं वो नहीं  माँ के रूप को साकार कर दू मैं वो नहीं  माँ की मैं क्या तारीफ करूँ  मैं तो उनकी जूती की धूल भी नहीं।  मेरी खुशियों में जो खुश होती है वो मेरी माँ है  मेरे दुःख में जो साथ होती है वो  मेरी माँ  है  जिसका आशीर्वाद हमेशा साथ रहे वो  मेरी माँ  है  और बिन कहे सब समझ जाये वो  मेरी माँ  है।  नारी (स्त्री) का क्या दोष है - समाज के आगे विवश स्त्री (नारी) माँ  हैं  तो मेरा अभिमान है  माँ  हैं  तो मेरा स्वाभिमान है माँ  हैं  तो मेरा सम्मान है    माँ  है तो मेरा नाम है।  माँ  ही तो भगवान का रूप है  माँ  ही इस जगत का स्वरूप है  माँ  ही तो जननी का रूप है  और  माँ  ही तो सबसे सुन्दर  संसार का स्वरूप है।   माँ  की ऊँगली पकड़ कर चलना सीखा  माँ  के आँचल में पलना सीखा   अब इससे आगे क्या कहुँ मैं  माँ  तुझसे ही तो मैंने जीना सीखा ।  मेरा गांव है शहर से निराला    माँ  मैं सीधा साधा भोला भाला  माँ  तेरे लिए सबसे अच्छा हूँ  कितना भी बड़ा हो जाऊ मैं  माँ लेकिन  माँ  तेरे लिए तो मैं बच्चा हूँ ।  ऐ मेरे मालिक  

नारी (स्त्री) का क्या दोष है - समाज के आगे विवश स्त्री (नारी)

लेखक - नविन 🖋 दोष क्या है नारी का - समाज नारी पर ही क्यूँ ऊँगली उठाये नमस्कार मेरे इस कहानी को पढ़ने से पहले मैं आपसे हाँथ जोड़ कर विनती करना चाहता हूँ यदि आपके पास समय है तभी आप पढियेगा अन्यथा बीच में कहानी को अधूरा छोड़ने से आपको समझने में कठिनाई होगी.. !  रामु काका हमारे गाँव के सबसे ईमानदार और खूब मेहनती इंसान थे उनका चूड़ी बनाने का व्यवसाय था। वह बहुत सुंदर सुंदर रंग बिरंग के चूड़ी बनाते थे, हमारे गाँव के सभी महिलाएँ उनसे ही चूड़ियाँ खरीदा करती थी, रामु काका की पत्नी "बुधनी" उनके कामों में खूब मदद करती थी। गाँव गाँव घूमकर चूड़ी बेचा करती थी और जो पैसे जमा होते थे उससे घर का राशन ले आती। और बचे हुए पैसे को एक गुलक् में रखते जाती थी। उन दोनों का बहोत ही आनंदमय जीवन बीत रहा था। बस दुःख था तो सिर्फ एक बात का के "रामु" काका के अपनी कोई औलाद नहीं थी। काकी इस बात को लेकर हमेशा दुखी रहती थी। और मन ही मन खूब रोती थी काका हमेशा उन्हें समझाते थे की अरे "बुधनी" रोती क्यों हैं भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जायेगा। काका की यह बात सुन कर काकी के मन में एक नई